तं याम्यपाशान्निर्मुच्य विप्रं मृत्योरमूमुचन्॥ २०
ta evaṃ suvinirṇīya dharmaṃ bhāgavataṃ nṛpa|
taṃ yāmyapāśānnirmucya vipraṃ mṛtyoramūmucan|| 20
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार भगवान्के पार्षदोंने भागवत-धर्मका पूरा-पूरा निर्णय सुना दिया और अजामिलको यमदूतोंके पाशसे छुड़ाकर मृत्युके मुखसे बचा लिया॥ २०॥
त एवं सुविनिर्णीय धर्मं भागवतं नृप।
तं याम्यपाशान्निर्मुच्य विप्रं मृत्योरमूमुचन्॥ २०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार भगवान्के पार्षदोंने भागवत-धर्मका पूरा-पूरा निर्णय सुना दिया और अजामिलको यमदूतोंके पाशसे छुड़ाकर मृत्युके मुखसे बचा लिया॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 708) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/2/20/