॥ श्रीहरिः ॥
द्विजः पाशाद्विनिर्मुक्तो गतभीः प्रकृतिं गतः।
ववन्दे शिरसा विष्णोः किङ्करान् दर्शनोत्सवः॥ २२
dvijaḥ pāśādvinirmukto gatabhīḥ prakṛtiṃ gataḥ|
vavande śirasā viṣṇoḥ kiṅkarān darśanotsavaḥ|| 22
अर्थ
अजामिल यमदूतोंके फंदेसे छूटकर निर्भय और स्वस्थ हो गया। उसने भगवान्के पार्षदोंके दर्शनजनित आनन्दमें मग्न होकर उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया॥ २२॥
द्विजः पाशाद्विनिर्मुक्तो गतभीः प्रकृतिं गतः।
ववन्दे शिरसा विष्णोः किङ्करान् दर्शनोत्सवः॥ २२
अजामिल यमदूतोंके फंदेसे छूटकर निर्भय और स्वस्थ हो गया। उसने भगवान्के पार्षदोंके दर्शनजनित आनन्दमें मग्न होकर उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 708) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/2/22/