जो प्रजाके रक्षक हैं, शासक हैं, समदर्शी और परोपकारी हैं—यदि वे ही प्रजाके प्रति विषमताका व्यवहार करने लगें तो फिर प्रजा किसकी शरण लेगी?॥ ३॥
प्रजानां पितरो ये च शास्तारः साधवः समाः।
यदि स्यात्तेषु वैषम्यं कं यान्ति शरणं प्रजाः॥ ३
जो प्रजाके रक्षक हैं, शासक हैं, समदर्शी और परोपकारी हैं—यदि वे ही प्रजाके प्रति विषमताका व्यवहार करने लगें तो फिर प्रजा किसकी शरण लेगी?॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 703) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/2/3/