मैं कुलटागामी और अत्यन्त अपवित्र हूँ। यदि पूर्वजन्ममें मैंने पुण्य न किये होते, तो मरनेके समय मेरी जीभ भगवान्के मनोमोहक नामका उच्चारण कैसे कर पाती?॥ ३३॥✎ 498
अन्यथा म्रियमाणस्य नाशुचेर्वृषलीपतेः।
वैकुण्ठनामग्रहणं जिह्वा वक्तुमिहार्हति॥ ३३
मैं कुलटागामी और अत्यन्त अपवित्र हूँ। यदि पूर्वजन्ममें मैंने पुण्य न किये होते, तो मरनेके समय मेरी जीभ भगवान्के मनोमोहक नामका उच्चारण कैसे कर पाती?॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 710) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/2/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)