श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.5

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यस्याङ्के शिर आधाय लोकः स्वपिति निर्वृतः।

स्वयं धर्ममधर्मं वा न हि वेद यथा पशुः॥ ५

yasyāṅke śira ādhāya lokaḥ svapiti nirvṛtaḥ|

svayaṃ dharmamadharmaṃ vā na hi veda yathā paśuḥ|| 5

अर्थ

साधारण लोग पशुओंके समान धर्म और अधर्मका स्वरूप न जानकर किसी सत्पुरुषपर विश्वास कर लेते हैं, उसकी गोदमें सिर रखकर निर्भय और निश्चिन्त सो जाते हैं॥ ५॥

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