श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.11

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति देवः स आपृष्टः प्रजासंयमनो यमः।

प्रीतः स्वदूतान् प्रत्याह स्मरन् पादाम्बुजं हरेः॥ ११

iti devaḥ sa āpṛṣṭaḥ prajāsaṃyamano yamaḥ|

prītaḥ svadūtān pratyāha smaran pādāmbujaṃ hareḥ|| 11

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब दूतोंने इस प्रकार प्रश्न किया, तब देवशिरोमणि प्रजाके शासक भगवान् यमराजने प्रसन्‍न होकर श्रीहरिके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए उनसे कहा॥ ११॥

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