श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.12

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यम उवाच

परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्‍च

ओतं प्रोतं पटवद्यत्र विश्‍वम्।

यदंशतोऽस्य स्थितिजन्मनाशा

नस्योतवद् यस्य वशे च लोकः॥ १२

paro madanyo jagatastasthuṣaśca

otaṃ protaṃ paṭavadyatra viśvam|

yadaṃśato'sya sthitijanmanāśā

nasyotavad yasya vaśe ca lokaḥ|| 12

अर्थ

यमराजने कहा—दूतो! मेरे अतिरिक्त एक और ही चराचर जगत‍्के स्वामी हैं। उन्हींमें यह सम्पूर्ण जगत् सूतमें वस्त्रके समान ओत-प्रोत है। उन्हींके अंश ब्रह्मा, विष्णु और शंकर इस जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करते हैं। उन्हींने इस सारे जगत‍्को नथे हुए बैलके समान अपने अधीन कर रखा है॥ १२॥✎ 500 1362 1363

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #500 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #1362 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति, → निऋर्ऋति,
  • #1363 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति, → निर्ऋति,

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