श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.13

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यो नामभिर्वाचि जनान्‍निजायां

बध्नाति तन्त्यामिव दामभिर्गाः।

यस्मै बलिं त इमे नामकर्म-

निबन्धबद्धाश्‍चकिता वहन्ति॥ १३

yo nāmabhirvāci janānnijāyāṃ

badhnāti tantyāmiva dāmabhirgāḥ|

yasmai baliṃ ta ime nāmakarma-

nibandhabaddhāścakitā vahanti|| 13

अर्थ

मेरे प्यारे दूतो! जैसे किसान अपने बैलोंको पहले छोटी-छोटी रस्सियोंमें बाँधकर फिर उन रस्सियोंको एक बड़ी आड़ी रस्सीमें बाँध देते हैं, वैसे ही जगदीश्‍वर भगवान्‌ने भी ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्य आदि आश्रमरूप छोटी-छोटी नामकी रस्सियोंमें बाँधकर फिर सब नामोंको वेदवाणीरूप बड़ी रस्सीमें बाँध रखा है। इस प्रकार सारे जीव नाम एवं कर्मरूप बन्धनमें बँधे हुए भयभीत होकर उन्हें ही अपना सर्वस्व भेंट कर रहे हैं॥ १३॥✎ 500 1362 1363

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #500 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #1362 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति, → निऋर्ऋति,
  • #1363 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति, → निर्ऋति,

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