॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.3.16
यं वै न गोभिर्मनसासुभिर्वा
हृदा गिरा वासुभृतो विचक्षते।
आत्मानमन्तर्हृदि सन्तमात्मनां
चक्षुर्यथैवाकृतयस्ततः परम्॥ १६
yaṃ vai na gobhirmanasāsubhirvā
hṛdā girā vāsubhṛto vicakṣate|
ātmānamantarhṛdi santamātmanāṃ
cakṣuryathaivākṛtayastataḥ param|| 16
अर्थ
दूतो! जिस प्रकार घट, पट आदि रूपवान् पदार्थ अपने प्रकाशक नेत्रको नहीं देख सकते—वैसे ही अन्तःकरणमें अपने साक्षीरूपसे स्थित परमात्माको कोई भी प्राणी इन्द्रिय, मन, प्राण, हृदय या वाणी आदि किसी भी साधनके द्वारा नहीं जान सकता॥ १६॥