श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.17

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तस्यात्मतन्त्रस्य हरेरधीशितुः

परस्य मायाधिपतेर्महात्मनः।

प्रायेण दूता इह वै मनोहरा-

श्‍चरन्ति तद्रूपगुणस्वभावाः॥ १७

tasyātmatantrasya hareradhīśituḥ

parasya māyādhipatermahātmanaḥ|

prāyeṇa dūtā iha vai manoharā-

ścaranti tadrūpaguṇasvabhāvāḥ|| 17

अर्थ

वे प्रभु सबके स्वामी और स्वयं परम स्वतन्त्र हैं। उन्हीं मायापति पुरुषोत्तमके दूत उन्हींके समान परम मनोहर रूप, गुण और स्वभावसे सम्पन्‍न होकर इस लोकमें प्रायः विचरण किया करते हैं॥ १७॥

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