श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

भूतानि विष्णोः सुरपूजितानि

दुर्दर्शलिङ्गानि महाद्भुतानि।

रक्षन्ति तद्भक्तिमतः परेभ्यो

मत्तश्‍च मर्त्यानथ सर्वतश्‍च॥ १८

bhūtāni viṣṇoḥ surapūjitāni

durdarśaliṅgāni mahādbhutāni|

rakṣanti tadbhaktimataḥ parebhyo

mattaśca martyānatha sarvataśca|| 18

अर्थ

विष्णुभगवान्‌के सुरपूजित एवं परम अलौकिक पार्षदोंका दर्शन बड़ा दुर्लभ है। वे भगवान्‌के भक्तजनोंको उनके शत्रुओंसे, मुझसे और अग्‍नि आदि सब विपत्तियोंसे सर्वथा सुरक्षित रखते हैं॥ १८॥

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