श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.10

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यूयं च पित्रान्वादिष्टा१ देवदेवेन चानघाः।

प्रजासर्गाय हि कथं वृक्षान् निर्दग्धुमर्हथ॥ १०

yūyaṃ ca pitrānvādiṣṭā devadevena cānaghāḥ|

prajāsargāya hi kathaṃ vṛkṣān nirdagdhumarhatha|| 10

अर्थ

निष्पाप प्रचेताओ! आपके पिता और देवाधिदेव भगवान्‌ने आपलोगोंको यह आदेश दिया है कि प्रजाकी सृष्टि करो। ऐसी स्थितिमें आप वृक्षोंको जला डालें, यह कैसे उचित हो सकता है॥ १०॥✎ 507 508

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—त्वादिष्टा।

    (मुद्रित पृष्ठ 718)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #507 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #508 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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