श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.34

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां

यथाशयं देहगतो विभाति।

यथानिलः पार्थिवमाश्रितो गुणं

स ईश्‍वरो मे कुरुतान्मनोरथम्॥ ३४

yaḥ prākṛtairjñānapathairjanānāṃ

yathāśayaṃ dehagato vibhāti|

yathānilaḥ pārthivamāśrito guṇaṃ

sa īśvaro me kurutānmanoratham|| 34

अर्थ

लोगोंकी उपासनाएँ प्रायः साधारण कोटिकी होती हैं। अतः आप सबके हृदयमें रहकर उनकी भावनाके अनुसार भिन्‍न-भिन्‍न देवताओंके रूपमें प्रतीत होते रहते हैं—ठीक वैसे ही जैसे हवा गन्धका आश्रय लेकर सुगन्धित प्रतीत होती है; परन्तु वास्तवमें सुगन्धित नहीं होती। ऐसे सबकी भावनाओंका अनुसरण करनेवाले प्रभु मेरी अभिलाषा पूर्ण करें॥ ३४॥

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