श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विन्ध्याचलके अघमर्षण तीर्थमें जब प्रजापति दक्षने इस प्रकार स्तुति की, तब भक्तवत्सल भगवान् उनके सामने प्रकट हुए ॥ ३५॥✎ 511
इति स्तुतः संस्तुवतः स तस्मिन्नघमर्षणे।
आविरासीत् कुरुश्रेष्ठ भगवान् भक्तवत्सलः॥ ३५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विन्ध्याचलके अघमर्षण तीर्थमें जब प्रजापति दक्षने इस प्रकार स्तुति की, तब भक्तवत्सल भगवान् उनके सामने प्रकट हुए ॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.4.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 722) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/4/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)