श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.35

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति स्तुतः संस्तुवतः स तस्मिन्‍नघमर्षणे।

आविरासीत् कुरुश्रेष्ठ भगवान् भक्तवत्सलः॥ ३५

iti stutaḥ saṃstuvataḥ sa tasminnaghamarṣaṇe|

āvirāsīt kuruśreṣṭha bhagavān bhaktavatsalaḥ|| 35

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विन्ध्याचलके अघमर्षण तीर्थमें जब प्रजापति दक्षने इस प्रकार स्तुति की, तब भक्तवत्सल भगवान् उनके सामने प्रकट हुए ॥ ३५॥✎ 511

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #511 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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