॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.4.40
स्तूयमानोऽनुगायद्भिः सिद्धगन्धर्वचारणैः।
रूपं तन्महदाश्चर्यं विचक्ष्यागतसाध्वसः॥ ४०
stūyamāno'nugāyadbhiḥ siddhagandharvacāraṇaiḥ|
rūpaṃ tanmahadāścaryaṃ vicakṣyāgatasādhvasaḥ|| 40
अर्थ
त्रिभुवनपति भगवान्ने त्रैलोक्यविमोहन रूप धारण कर रखा था। नारद, नन्द, सुनन्द आदि पार्षद उनके चारों ओर खड़े थे। इन्द्र आदि देवेश्वरगण स्तुति कर रहे थे तथा सिद्ध, गन्धर्व और चारण भगवान्के गुणोंका गान कर रहे थे। यह अत्यन्त आश्चर्यमय और अलौकिक रूप देखकर दक्षप्रजापति कुछ सहम गये॥ ३९-४०॥✎ 511