प्रजापति दक्षने आनन्दसे भरकर भगवान्के चरणोंमें साष्टांग प्रणाम किया। जैसे झरनोंके जलसे नदियाँ भर जाती हैं, वैसे ही परमानन्दके उद्रेकसे उनकी एक-एक इन्द्रिय भर गयी और आनन्दपरवश हो जानेके कारण वे कुछ भी बोल न सके॥ ४१॥✎ 511
ननाम दण्डवद् भूमौ प्रहृष्टात्मा प्रजापतिः।
न किञ्चनोदीरयितुमशकत् तीव्रया मुदा।
आपूरितमनोद्वारैर्ह्रदिन्य इव निर्झरैः॥ ४१
प्रजापति दक्षने आनन्दसे भरकर भगवान्के चरणोंमें साष्टांग प्रणाम किया। जैसे झरनोंके जलसे नदियाँ भर जाती हैं, वैसे ही परमानन्दके उद्रेकसे उनकी एक-एक इन्द्रिय भर गयी और आनन्दपरवश हो जानेके कारण वे कुछ भी बोल न सके॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.4.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 722) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/4/41/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)