श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.41

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

ननाम दण्डवद् भूमौ प्रहृष्टात्मा प्रजापतिः।

न किञ्चनोदीरयितुमशकत् तीव्रया मुदा।

आपूरितमनोद्वारैर्ह्रदिन्य इव निर्झरैः॥ ४१

nanāma daṇḍavad bhūmau prahṛṣṭātmā prajāpatiḥ|

na kiñcanodīrayitumaśakat tīvrayā mudā|

āpūritamanodvārairhradinya iva nirjharaiḥ|| 41

अर्थ

प्रजापति दक्षने आनन्दसे भरकर भगवान्‌के चरणोंमें साष्टांग प्रणाम किया। जैसे झरनोंके जलसे नदियाँ भर जाती हैं, वैसे ही परमानन्दके उद्रेकसे उनकी एक-एक इन्द्रिय भर गयी और आनन्दपरवश हो जानेके कारण वे कुछ भी बोल न सके॥ ४१॥✎ 511

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #511 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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