श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.51

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

एषा पञ्चजनस्याङ्ग दुहिता वै प्रजापतेः।

असिक्‍नी नाम पत्नीत्वे प्रजेश प्रतिगृह्यताम्॥ ५१

eṣā pañcajanasyāṅga duhitā vai prajāpateḥ|

asiknī nāma patnītve prajeśa pratigṛhyatām|| 51

अर्थ

प्रिय दक्ष! देखो, यह पंचजन प्रजापतिकी कन्या असिक्‍नी है। इसे तुम अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहण करो॥ ५१॥

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