श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.52

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

मिथुनव्यवायधर्मस्त्वं प्रजासर्गमिमं पुनः।

मिथुनव्यवायधर्मिण्यां भूरिशो भावयिष्यसि॥ ५२

mithunavyavāyadharmastvaṃ prajāsargamimaṃ punaḥ|

mithunavyavāyadharmiṇyāṃ bhūriśo bhāvayiṣyasi|| 52

अर्थ

अब तुम गृहस्थोचित स्त्रीसहवासरूप धर्मको स्वीकार करो। यह असिक्‍नी भी उसी धर्मको स्वीकार करेगी। तब तुम इसके द्वारा बहुत-सी प्रजा उत्पन्‍न कर सकोगे॥ ५२॥

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