प्रजापते! अबतक तो मानसी सृष्टि होती थी, परन्तु अब तुम्हारे बाद सारी प्रजा मेरी मायासे स्त्री-पुरुषके संयोगसे ही उत्पन्न होगी तथा मेरी सेवामें तत्पर रहेगी॥ ५३॥
त्वत्तोऽधस्तात् प्रजाः सर्वा मिथुनीभूय मायया।
मदीयया भविष्यन्ति हरिष्यन्ति च मे बलिम्॥ ५३
प्रजापते! अबतक तो मानसी सृष्टि होती थी, परन्तु अब तुम्हारे बाद सारी प्रजा मेरी मायासे स्त्री-पुरुषके संयोगसे ही उत्पन्न होगी तथा मेरी सेवामें तत्पर रहेगी॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.4.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 723) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/4/53/