श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.53

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

त्वत्तोऽधस्तात् प्रजाः सर्वा मिथुनीभूय मायया।

मदीयया भविष्यन्ति हरिष्यन्ति च मे बलिम्॥ ५३

tvatto'dhastāt prajāḥ sarvā mithunībhūya māyayā|

madīyayā bhaviṣyanti hariṣyanti ca me balim|| 53

अर्थ

प्रजापते! अबतक तो मानसी सृष्टि होती थी, परन्तु अब तुम्हारे बाद सारी प्रजा मेरी मायासे स्त्री-पुरुषके संयोगसे ही उत्पन्‍न होगी तथा मेरी सेवामें तत्पर रहेगी॥ ५३॥

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