श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.30

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

दाक्षायणाः संशृणुत गदतो निगमं मम।

अन्विच्छतानुपदवीं भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलाः॥ ३०✎ 1075

dākṣāyaṇāḥ saṃśṛṇuta gadato nigamaṃ mama|

anvicchatānupadavīṃ bhrātṝṇāṃ bhrātṛvatsalāḥ|| 30

अर्थ

उन्होंने कहा—‘दक्षप्रजापतिके पुत्रो! मैं तुमलोगोंको जो उपदेश देता हूँ, उसे सुनो। तुमलोग तो अपने भाइयोंसे बड़ा प्रेम करते हो। इसलिये उनके मार्गका अनुसन्धान करो॥ ३०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1075 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भ्रातृणां → भ्रातॄणां

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