श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.33

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

सध्रीचीनं प्रतीचीनं परस्यानुपथं गताः।

नाद्यापि ते निवर्तन्ते पश्चिमा यामिनीरिव॥ ३३

sadhrīcīnaṃ pratīcīnaṃ parasyānupathaṃ gatāḥ|

nādyāpi te nivartante paścimā yāminīriva|| 33

अर्थ

वे उस पथके पथिक बने, जो अन्तर्मुखी वृत्तिसे प्राप्त होनेयोग्य, अत्यन्त सुन्दर और भगवत्प्राप्तिके अनुकूल है। वे बीती हुई रात्रियोंके समान न तो उस मार्गसे अबतक लौटे हैं और न आगे लौटेंगे ही॥ ३३॥

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