परीक्षित्! शबलाश्वोंको इस प्रकार उपदेश देकर देवर्षि नारद वहाँसे चले गये और उन लोगोंने भी अपने भाइयोंके मार्गका ही अनुगमन किया; क्योंकि नारदजीका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता॥ ३२॥
एतावदुक्त्वा प्रययौ नारदोऽमोघदर्शनः।
तेऽपि चान्वगमन्मार्गं भ्रातॄणामेव मारिष॥ ३२
परीक्षित्! शबलाश्वोंको इस प्रकार उपदेश देकर देवर्षि नारद वहाँसे चले गये और उन लोगोंने भी अपने भाइयोंके मार्गका ही अनुगमन किया; क्योंकि नारदजीका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.5.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 728) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/5/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1077 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भ्रातृणामेव → भ्रातॄणामेव