श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.32

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

एतावदुक्‍त्वा प्रययौ नारदोऽमोघदर्शनः।

तेऽपि चान्वगमन्मार्गं भ्रातॄणामेव मारिष॥ ३२✎ 1077

etāvaduktvā prayayau nārado'moghadarśanaḥ|

te'pi cānvagamanmārgaṃ bhrātṝṇāmeva māriṣa|| 32

अर्थ

परीक्षित्! शबलाश्वोंको इस प्रकार उपदेश देकर देवर्षि नारद वहाँसे चले गये और उन लोगोंने भी अपने भाइयोंके मार्गका ही अनुगमन किया; क्योंकि नारदजीका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता॥ ३२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1077 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भ्रातृणामेव → भ्रातॄणामेव

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