श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.4

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः।

धर्मे पारमहंस्ये च प्रोत्पन्‍नमतयोऽप्युत॥ ४

tadupasparśanādeva vinirdhūtamalāśayāḥ|

dharme pāramahaṃsye ca protpannamatayo'pyuta|| 4

अर्थ

नारायण-सरमें स्नान करते ही हर्यश्वोंके अन्तः-करण शुद्ध हो गये, उनकी बुद्धि भागवतधर्ममें लग गयी। फिर भी अपने पिता दक्षकी आज्ञासे बँधे होनेके कारण वे उग्र तपस्या ही करते रहे। जब देवर्षि नारदने देखा कि भागवतधर्ममें रुचि होनेपर भी ये प्रजावृद्धिके लिये ही तत्पर हैं, तब उन्होंने उनके पास आकर कहा—‘अरे हर्यश्वो! तुम प्रजापति हो तो क्या हुआ। वास्तवमें तो तुमलोग मूर्ख ही हो। बतलाओ तो, जब तुमलोगोंने पृथ्वीका अन्त ही नहीं देखा, तब सृष्टि कैसे करोगे? बड़े खेदकी बात है!॥ ४—६॥

यह अर्थ श्लोक 4–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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