परीक्षित्! उसी समय देवराज इन्द्रको चेत हुआ। वे समझ गये कि मैंने अपने गुरुदेवकी अवहेलना की है। वे भरी सभामें स्वयं ही अपनी निन्दा करने लगे॥ १०॥
तर्ह्येव प्रतिबुद्ध्येन्द्रो गुरुहेलनमात्मनः।
गर्हयामास सदसि स्वयमात्मानमात्मना॥ १०
परीक्षित्! उसी समय देवराज इन्द्रको चेत हुआ। वे समझ गये कि मैंने अपने गुरुदेवकी अवहेलना की है। वे भरी सभामें स्वयं ही अपनी निन्दा करने लगे॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 734) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/7/10/