मेरे गुरुदेव बृहस्पतिजी ज्ञानके अथाह समुद्र हैं। मैंने बड़ी शठता की। अब मैं उनके चरणोंमें अपना माथा टेककर उन्हें मनाऊँगा’॥ १५॥
अथाहममराचार्यमगाधधिषणं द्विजम्।
प्रसादयिष्ये निशठः शीर्ष्णा तच्चरणं स्पृशन्॥ १५
मेरे गुरुदेव बृहस्पतिजी ज्ञानके अथाह समुद्र हैं। मैंने बड़ी शठता की। अब मैं उनके चरणोंमें अपना माथा टेककर उन्हें मनाऊँगा’॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 735) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/7/15/