देवताओंने कहा—बेटा विश्वरूप! तुम्हारा कल्याण हो। हम तुम्हारे आश्रमपर अतिथिके रूपमें आये हैं। हम एक प्रकारसे तुम्हारे पितर हैं। इसलिये तुम हमलोगोंकी समयोचित्त अभिलाषा पूर्ण करो॥ २७॥
वयं तेऽतिथयः प्राप्ता आश्रमं भद्रमस्तु ते।
कामः सम्पाद्यतां तात पितॄणां समयोचितः॥ २७
देवताओंने कहा—बेटा विश्वरूप! तुम्हारा कल्याण हो। हम तुम्हारे आश्रमपर अतिथिके रूपमें आये हैं। हम एक प्रकारसे तुम्हारे पितर हैं। इसलिये तुम हमलोगोंकी समयोचित्त अभिलाषा पूर्ण करो॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 736) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/7/27/