प्रत्याख्यास्यति तच्छिष्यः स एव स्वार्थ उच्यते॥ ३५
vigarhitaṃ dharmaśīlairbrahmavarca upavyayam|
kathaṃ nu madvidho nāthā lokeśairabhiyācitam|
pratyākhyāsyati tacchiṣyaḥ sa eva svārtha ucyate|| 35
अर्थ
विश्वरूपने कहा—पुरोहितीका काम ब्रह्मतेजको क्षीण करनेवाला है। इसलिये धर्मशील महात्माओंने उसकी निन्दा की है। किन्तु आप मेरे स्वामी हैं और लोकेश्वर होकर भी मुझसे उसके लिये प्रार्थना कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें मेरे-जैसा व्यक्ति भला, आपलोगोंको कोरा जवाब कैसे दे सकता है? मैं तो आपलोगोंका सेवक हूँ। आपकी आज्ञाओंका पालन करना ही मेरा स्वार्थ है॥ ३५॥
विगर्हितं धर्मशीलैर्ब्रह्मवर्च उपव्ययम्।
कथं नु मद्विधो नाथा लोकेशैरभियाचितम्।
प्रत्याख्यास्यति तच्छिष्यः स एव स्वार्थ उच्यते॥ ३५
विश्वरूपने कहा—पुरोहितीका काम ब्रह्मतेजको क्षीण करनेवाला है। इसलिये धर्मशील महात्माओंने उसकी निन्दा की है। किन्तु आप मेरे स्वामी हैं और लोकेश्वर होकर भी मुझसे उसके लिये प्रार्थना कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें मेरे-जैसा व्यक्ति भला, आपलोगोंको कोरा जवाब कैसे दे सकता है? मैं तो आपलोगोंका सेवक हूँ। आपकी आज्ञाओंका पालन करना ही मेरा स्वार्थ है॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 737) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/7/35/