श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.7.36

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अकिञ्चनानां हि धनं शिलोञ्छनं

तेनेह निर्वर्तितसाधुसत्क्रियः।

कथं विगर्ह्यं नु करोम्यधीश्‍वराः

पौरोधसं हृष्यति येन दुर्मतिः॥ ३६

akiñcanānāṃ hi dhanaṃ śiloñchanaṃ

teneha nirvartitasādhusatkriyaḥ|

kathaṃ vigarhyaṃ nu karomyadhīśvarāḥ

paurodhasaṃ hṛṣyati yena durmatiḥ|| 36

अर्थ

देवगण! हम अकिंचन हैं। खेती कट जानेपर अथवा अनाजकी हाट उठ जानेपर उसमेंसे गिरे हुए कुछ दाने चुन लाते हैं और उसीसे अपने देवकार्य तथा पितृकार्य सम्पन्‍न कर लेते हैं। लोकपालो! इस प्रकार जब मेरी जीविका चल ही रही है, तब मैं पुरोहितीकी निन्दनीय वृत्ति क्यों करूँ? उससे तो केवल वे ही लोग प्रसन्‍न होते हैं, जिनकी बुद्धि बिगड़ गयी है॥ ३६॥

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