जो काम आपलोग मुझसे कराना चाहते हैं वह निन्दनीय है—फिर भी मैं आपके कामसे मुँह नहीं मोड़ सकता; क्योंकि आपलोगोंकी माँग ही कितनी है। इसलिये आपलोगोंका मनोरथ मैं तन-मन-धनसे पूरा करूँगा॥ ३७॥
तथापि न प्रतिब्रूयां गुरुभिः प्रार्थितं कियत्।
भवतां प्रार्थितं सर्वं प्राणैरर्थैश्च साधये॥ ३७
जो काम आपलोग मुझसे कराना चाहते हैं वह निन्दनीय है—फिर भी मैं आपके कामसे मुँह नहीं मोड़ सकता; क्योंकि आपलोगोंकी माँग ही कितनी है। इसलिये आपलोगोंका मनोरथ मैं तन-मन-धनसे पूरा करूँगा॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 738) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/7/37/