बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रोंसे जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरुड और विष्वक्सेनजी अपने नामोच्चारणके प्रभावसे हमें सब प्रकारकी विपत्तियोंसे बचायें॥ २९॥✎ 1912
गरुडो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः॥ २९
बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रोंसे जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरुड और विष्वक्सेनजी अपने नामोच्चारणके प्रभावसे हमें सब प्रकारकी विपत्तियोंसे बचायें॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.8.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 742) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/8/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1912 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): प्रकरकी → प्रकारकी