श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.8.41

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।

तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात्॥ ४१

ya idaṃ śṛṇuyāt kāle yo dhārayati cādṛtaḥ|

taṃ namasyanti bhūtāni mucyate sarvato bhayāt|| 41

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जो पुरुष इस नारायणकवचको समयपर सुनता है और जो आदरपूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदरसे झुक जाते हैं और वह सब प्रकारके भयोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४१॥

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