विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्की प्रेरणासे देवताओंका दधीचि ऋषिके पास जाना✎ 518
श्रीशुक उवाच
तस्यासन् विश्वरूपस्य शिरांसि त्रीणि भारत।
सोमपीथं सुरापीथमन्नादमिति शुश्रुम॥ १
tasyāsan viśvarūpasya śirāṃsi trīṇi bhārata|
somapīthaṃ surāpīthamannādamiti śuśruma|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! हमने सुना है कि विश्वरूपके तीन सिर थे। वे एक मुँहसे सोमरस तथा दूसरेसे सुरा पीते थे और तीसरेसे अन्न खाते थे॥ १॥
तस्यासन् विश्वरूपस्य शिरांसि त्रीणि भारत।
सोमपीथं सुरापीथमन्नादमिति शुश्रुम॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! हमने सुना है कि विश्वरूपके तीन सिर थे। वे एक मुँहसे सोमरस तथा दूसरेसे सुरा पीते थे और तीसरेसे अन्न खाते थे॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.9.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 744) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/9/1/