श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.1

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अथ नवमोऽध्यायः

विश्‍वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌की प्रेरणासे देवताओंका दधीचि ऋषिके पास जाना✎ 518

श्रीशुक उवाच

तस्यासन् विश्‍वरूपस्य शिरांसि त्रीणि भारत।

सोमपीथं सुरापीथमन्‍नादमिति शुश्रुम॥ १

tasyāsan viśvarūpasya śirāṃsi trīṇi bhārata|

somapīthaṃ surāpīthamannādamiti śuśruma|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! हमने सुना है कि विश्‍वरूपके तीन सिर थे। वे एक मुँहसे सोमरस तथा दूसरेसे सुरा पीते थे और तीसरेसे अन्‍न खाते थे॥ १॥

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