परीक्षित्! वह प्रतिदिन अपने शरीरके सब ओर बाणके बराबर बढ़ जाया करता था। वह जले हुए पहाड़के समान काला और बड़े डील-डौलका था। उसके शरीरमेंसे सन्ध्याकालीन बादलोंके समान दीप्ति निकलती रहती थी॥ १३॥
विष्वग्विवर्धमानं तमिषुमात्रं दिने दिने।
दग्धशैलप्रतीकाशं सन्ध्याभ्रानीकवर्चसम्॥ १३
परीक्षित्! वह प्रतिदिन अपने शरीरके सब ओर बाणके बराबर बढ़ जाया करता था। वह जले हुए पहाड़के समान काला और बड़े डील-डौलका था। उसके शरीरमेंसे सन्ध्याकालीन बादलोंके समान दीप्ति निकलती रहती थी॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.9.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 745) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/9/13/