श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यो नः सपत्नैर्भृशमर्द्यमानान्

देवर्षितिर्यङ्नृषु नित्य एव।

कृतावतारस्तनुभिः स्वमायया

कृत्वाऽऽत्मसात् पाति युगे युगे च॥ २६

yo naḥ sapatnairbhṛśamardyamānān

devarṣitiryaṅnṛṣu nitya eva|

kṛtāvatārastanubhiḥ svamāyayā

kṛtvā''tmasāt pāti yuge yuge ca|| 26

अर्थ

वे प्रभु जब देखते हैं कि देवता अपने शत्रुओंसे बहुत पीड़ित हो रहे हैं, तब वे वास्तवमें निर्विकार रहनेपर भी अपनी मायाका आश्रय लेकर देवता, ऋषि, पशु-पक्षी और मनुष्यादि योनियोंमें अवतार लेते हैं, तथा युग-युगमें हमें अपना समझकर हमारी रक्षा करते हैं॥ २६॥

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