श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.27

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तमेव देवं वयमात्मदैवतं ✎ 1086

परं प्रधानं पुरुषं विश्‍वमन्यम्।

व्रजाम सर्वे शरणं शरण्यं

स्वानां स नो धास्यति शं महात्मा॥ २७

tameva devaṃ vayamātmadaivataṃ

paraṃ pradhānaṃ puruṣaṃ viśvamanyam|

vrajāma sarve śaraṇaṃ śaraṇyaṃ

svānāṃ sa no dhāsyati śaṃ mahātmā|| 27

अर्थ

वे ही सबके आत्मा और परमाराध्य देव हैं। वे ही प्रकृति और पुरुषरूपसे विश्‍वके कारण हैं। वे विश्‍वसे पृथक् भी हैं और विश्‍वरूप भी हैं। हम सब उन्हीं शरणागतवत्सल भगवान् श्रीहरिकी शरण ग्रहण करते हैं। उदारशिरोमणि प्रभु अवश्य ही अपने निजजन हम देवताओंका कल्याण करेंगे॥ २७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1086 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वयमात्मदैवत → वयमात्मदैवतं

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