श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.28

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति तेषां महाराज सुराणामुपतिष्ठताम्१।

प्रतीच्यां दिश्यभूदाविः शङ्खचक्रगदाधरः॥ २८

iti teṣāṃ mahārāja surāṇāmupatiṣṭhatām|

pratīcyāṃ diśyabhūdāviḥ śaṅkhacakragadādharaḥ|| 28

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—महाराज! जब देवताओंने इस प्रकार भगवान्‌की स्तुति की, तब स्वयं शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी भगवान् उनके सामने पश्चिमकी ओर (अन्तर्देशमें) प्रकट हुए॥ २८॥✎ 521 522

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मधिति०।

    (मुद्रित पृष्ठ 747)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #521 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #522 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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