॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.9.42
अथ भगवंस्तवास्माभिरखिलजगदुत्पत्तिस्थितिलयनिमित्तायमानदिव्यमायाविनोदस्य सकलजीवनिकायानामन्तर्हृदयेषु बहिरपि च ब्रह्मप्रत्यगात्मस्वरूपेण प्रधानरूपेण च यथादेशकालदेहावस्थानविशेषं तदुपादानोपलम्भकतयानुभवतः सर्वप्रत्ययसाक्षिण आकाशशरीरस्य साक्षात्परब्रह्मणः परमात्मनः कियानिह वा अर्थविशेषो विज्ञापनीयः स्याद् विस्फुलिङ्गादिभिरिव हिरण्यरेतसः॥ ४२॥
atha bhagavaṃstavāsmābhirakhilajagadutpattisthitilayanimittāyamānadivyamāyāvinodasya sakalajīvanikāyānāmantarhṛdayeṣu bahirapi ca brahmapratyagātmasvarūpeṇa pradhānarūpeṇa ca yathādeśakāladehāvasthānaviśeṣaṃ tadupādānopalambhakatayānubhavataḥ sarvapratyayasākṣiṇa ākāśaśarīrasya sākṣātparabrahmaṇaḥ paramātmanaḥ kiyāniha vā arthaviśeṣo vijñāpanīyaḥ syād visphuliṅgādibhiriva hiraṇyaretasaḥ|| 42||
अर्थ
प्रभो! जिस प्रकार अग्निकी ही अंशभूत चिनगारियाँ आदि अग्निको प्रकाशित करनेमें असमर्थ हैं, वैसे ही हम भी आपको अपना कोई भी स्वार्थ-परमार्थ निवेदन करनेमें असमर्थ हैं। आपसे भला, कहना ही क्या है! क्योंकि आप सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लय करनेवाली दिव्य मायाके साथ विनोद करते रहते हैं तथा समस्त जीवोंके अन्तःकरणमें ब्रह्म और अन्तर्यामीके रूपमें विराजमान रहते हैं। केवल इतना ही नहीं, उनके बाहर भी प्रकृतिके रूपसे आप ही विराजमान हैं। जगत्में जितने भी देश, काल, शरीर और अवस्था आदि हैं, उनके उपादान और प्रकाशकके रूपमें आप ही उनका अनुभव करते रहते हैं। आप सभी वृत्तियोंके साक्षी हैं। आप आकाशके समान सर्वगत हैं, निर्लिप्त हैं। आप स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं॥ ४२॥