॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.9.43
अत एव स्वयं तदुपकल्पयास्माकं भगवतः परमगुरोस्तव चरणशतपलाशच्छायां विविधवृजिनसंसारपरिश्रमोपशमनीमुपसृतानां वयं यत्कामेनोपसादिताः॥ ४३॥
ata eva svayaṃ tadupakalpayāsmākaṃ bhagavataḥ paramagurostava caraṇaśatapalāśacchāyāṃ vividhavṛjinasaṃsārapariśramopaśamanīmupasṛtānāṃ vayaṃ yatkāmenopasāditāḥ|| 43||
अर्थ
अतएव हम अपना अभिप्राय आपसे निवेदन करें—इसकी अपेक्षा न रखकर जिस अभिलाषासे हमलोग यहाँ आये हैं, उसे पूर्ण कीजिये। आप अचिन्त्य ऐश्वर्यसम्पन्न और जगत्के परमगुरु हैं। हम आपके चरणकमलोंकी छत्रछायामें आये हैं, जो विविध पापोंके फलस्वरूप जन्म-मृत्युरूप संसारमें भटकनेकी थकावटको मिटानेवाली है॥ ४३॥