श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयं

प्रधानपुम्भ्यां नरदेव सत्यकृत्।

य एष राजन्‍नपि काल ईशिता

सत्त्वं सुरानीकमिवैधयत्यतः।

तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो

रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः॥ ११

kālaṃ carantaṃ sṛjatīśa āśrayaṃ

pradhānapumbhyāṃ naradeva satyakṛt|

ya eṣa rājannapi kāla īśitā

sattvaṃ surānīkamivaidhayatyataḥ|

tatpratyanīkānasurān surapriyo

rajastamaskān pramiṇotyuruśravāḥ|| 11

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् सत्यसंकल्प हैं। वे ही जगत‍्की उत्पत्तिके निमित्तभूत प्रकृति और पुरुषके सहकारी एवं आश्रयकालकी सृष्टि करते हैं। इसलिये वे कालके अधीन नहीं, काल ही उनके अधीन है। राजन्! ये कालस्वरूप ईश्‍वर जब सत्त्वगुणकी वृद्धि करते हैं, तब सत्त्वमय देवताओंका बल बढ़ाते हैं और तभी वे परमयशस्वी देवप्रिय परमात्मा देवविरोधी रजोगुणी एवं तमोगुणी दैत्योंका संहार करते हैं। वस्तुतः वे सम ही हैं॥ ११॥

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