श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.18

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

शपतोरसकृद्विष्णुं यद्ब्रह्म परमव्ययम्।

श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः॥ १८

śapatorasakṛdviṣṇuṃ yadbrahma paramavyayam|

śvitro na jāto jihvāyāṃ nāndhaṃ viviśatustamaḥ|| 18

अर्थ

अविनाशी परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णको ये पानी पी-पीकर गाली देते रहे हैं। परन्तु इसके फलस्वरूप न तो इनकी जीभमें कोढ़ ही हुआ और न इन्हें घोर अन्धकारमय नरककी ही प्राप्ति हुई॥ १८॥✎ 564 565 566 567

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #564 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #565 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #566 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #567 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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