इसलिये चाहे सुदृढ़ वैरभावसे या वैरहीन भक्तिभावसे, भयसे, स्नेहसे अथवा कामनासे—कैसे भी हो, भगवान्में अपना मन पूर्णरूपसे लगा देना चाहिये। भगवान्की दृष्टिसे इन भावोंमें कोई भेद नहीं है॥ २५॥✎ 568569570
तस्माद्वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा।
स्नेहात्कामेन वा युञ्ज्यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक्॥ २५
इसलिये चाहे सुदृढ़ वैरभावसे या वैरहीन भक्तिभावसे, भयसे, स्नेहसे अथवा कामनासे—कैसे भी हो, भगवान्में अपना मन पूर्णरूपसे लगा देना चाहिये। भगवान्की दृष्टिसे इन भावोंमें कोई भेद नहीं है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 808) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/1/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)