श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.24

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यन्‍निबद्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात्प्राणिनां वधः।

तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः।

परस्य दमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते॥ २४

yannibaddho'bhimāno'yaṃ tadvadhātprāṇināṃ vadhaḥ|

tathā na yasya kaivalyādabhimāno'khilātmanaḥ|

parasya damakarturhi hiṃsā kenāsya kalpyate|| 24

अर्थ

जिस शरीरमें अभिमान हो जाता है कि ‘यह मैं हूँ’, उस शरीरके वधसे प्राणियोंको अपना वध जान पड़ता है। किन्तु भगवान्‌में तो जीवोंके समान ऐसा अभिमान है नहीं; क्योंकि वे सर्वात्मा हैं, अद्वितीय हैं। वे जो दूसरोंको दण्ड देते हैं—वह भी उनके कल्याणके लिये ही, क्रोधवश अथवा द्वेषवश नहीं। तब भगवान्‌के सम्बन्धमें हिंसाकी कल्पना तो की ही कैसे जा सकती है॥ २४॥✎ 568 569 570

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #568 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #569 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #570 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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