एक नहीं, अनेकों मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर उसी प्रकार भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे॥ २९॥✎ 571572573574575576
कामाद् द्वेषाद्भयात्स्नेहाद्यथा भक्त्येश्वरे मनः।
आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः॥ २९
एक नहीं, अनेकों मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर उसी प्रकार भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 808) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/1/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
#571 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में
#572 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में