वास्तवमें भगवान् निर्गुण, अजन्मा, अव्यक्त और प्रकृतिसे परे हैं। ऐसा होनेपर भी अपनी मायाके गुणोंको स्वीकार करके वे बाध्य-बाधकभावको अर्थात् मरने और मारनेवाले दोनोंके परस्पर-विरोधी रूपोंको ग्रहण करते हैं॥ ६॥✎ 562563
निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः।
स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः॥ ६
वास्तवमें भगवान् निर्गुण, अजन्मा, अव्यक्त और प्रकृतिसे परे हैं। ऐसा होनेपर भी अपनी मायाके गुणोंको स्वीकार करके वे बाध्य-बाधकभावको अर्थात् मरने और मारनेवाले दोनोंके परस्पर-विरोधी रूपोंको ग्रहण करते हैं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 805) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/1/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)