त्वां च मां च स्मरन्काले कर्मबन्धात् प्रमुच्यते॥ १४
ya etat kīrtayenmahyaṃ tvayā gītamidaṃ naraḥ|
tvāṃ ca māṃ ca smarankāle karmabandhāt pramucyate|| 14
अर्थ
तुम्हारे द्वारा की हुई मेरी इस स्तुतिका जो मनुष्य कीर्तन करेगा और साथ ही मेरा और तुम्हारा स्मरण भी करेगा, वह समयपर कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जायगा॥ १४॥✎ 625
य एतत् कीर्तयेन्मह्यं त्वया गीतमिदं नरः।
त्वां च मां च स्मरन्काले कर्मबन्धात् प्रमुच्यते॥ १४
तुम्हारे द्वारा की हुई मेरी इस स्तुतिका जो मनुष्य कीर्तन करेगा और साथ ही मेरा और तुम्हारा स्मरण भी करेगा, वह समयपर कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जायगा॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 868) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/10/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#625 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीनृसिंहभगवान् ने → श्रीनृसिंहभगवान्ने