श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.15

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

प्रह्राद उवाच

वरं वरय एतत् ते वरदेशान्महेश्‍वर।

यदनिन्दत् पिता मे त्वामविद्वांस्तेज ऐश्‍वरम्॥ १५

varaṃ varaya etat te varadeśānmaheśvara|

yadanindat pitā me tvāmavidvāṃsteja aiśvaram|| 15

अर्थ

प्रह्लादजीने कहा—महेश्‍वर! आप वर देनेवालोंके स्वामी हैं। आपसे मैं एक वर और माँगता हूँ। मेरे पिताने आपके ईश्‍वरीय तेजको और सर्वशक्तिमान् चराचरगुरु स्वयं आपको न जानकर आपकी बड़ी निन्दा की है। ‘इस विष्णुने मेरे भाईको मार डाला है’ ऐसी मिथ्यादृष्टि रखनेके कारण पिताजी क्रोधके वेगको सहन करनेमें असमर्थ हो गये थे। इसीसे उन्होंने आपका भक्त होनेके कारण मुझसे भी द्रोह किया॥ १५-१६॥

यह अर्थ श्लोक 15–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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