श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.2

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

प्रह्राद उवाच

मा मां प्रलोभयोत्पत्त्याऽऽसक्तं कामेषु१ तैर्वरैः।

तत्सङ्गभीतो निर्विण्णो मुमुक्षुस्त्वामुपाश्रितः॥ २

mā māṃ pralobhayotpattyā''saktaṃ kāmeṣu tairvaraiḥ|

tatsaṅgabhīto nirviṇṇo mumukṣustvāmupāśritaḥ|| 2

अर्थ

प्रह्लादजीने कहा—प्रभो! मैं जन्मसे ही विषय-भोगोंमें आसक्त हूँ, अब मुझे इन वरोंके द्वारा आप लुभाइये नहीं। मैं उन भोगोंके संगसे डरकर, उनके द्वारा होनेवाली तीव्र वेदनाका अनुभव कर उनसे छूटनेकी अभिलाषासे ही आपकी शरणमें आया हूँ॥ २॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—नैतेषु।

    (मुद्रित पृष्ठ 867)

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