श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.20

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सर्वात्मना न हिंसन्ति भूतग्रामेषु किञ्चन।

उच्चावचेषु दैत्येन्द्र मद्भावेन गतस्पृहाः॥ २०

sarvātmanā na hiṃsanti bhūtagrāmeṣu kiñcana|

uccāvaceṣu daityendra madbhāvena gataspṛhāḥ|| 20

अर्थ

दैत्यराज! मेरे भक्तिभावसे जिनकी कामनाएँ नष्ट हो गयी हैं, वे सर्वत्र आत्मभाव हो जानेके कारण छोटे-बड़े किसी भी प्राणीको किसी भी प्रकारसे कष्ट नहीं पहुँचाते॥ २०॥✎ 626 2024

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #626 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीनृसिंहभगवान् ने → श्रीनृसिंहभगवान्‌ने
  • #2024 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें