श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.19

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

यत्र यत्र च मद्भक्ताः प्रशान्ताः समदर्शिनः।

साधवः समुदाचारास्ते पूयन्त्यपि कीकटाः॥ १९

yatra yatra ca madbhaktāḥ praśāntāḥ samadarśinaḥ|

sādhavaḥ samudācārāste pūyantyapi kīkaṭāḥ|| 19

अर्थ

मेरे शान्त, समदर्शी और सुखसे सदाचार पालन करनेवाले प्रेमी भक्तजन जहाँ-जहाँ निवास करते हैं, वे स्थान चाहे कीकट ही क्यों न हों, पवित्र हो जाते हैं॥ १९॥✎ 626 2024

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #626 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीनृसिंहभगवान् ने → श्रीनृसिंहभगवान्‌ने
  • #2024 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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