श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.18

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

त्रिःसप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ।

यत् साधोऽस्य गृहे जातो भवान्वै कुलपावनः॥ १८

triḥsaptabhiḥ pitā pūtaḥ pitṛbhiḥ saha te'nagha|

yat sādho'sya gṛhe jāto bhavānvai kulapāvanaḥ|| 18

अर्थ

श्रीनृसिंहभगवान्‌ने कहा—निष्पाप प्रह्लाद! तुम्हारे पिता स्वयं पवित्र होकर तर गये, इसकी तो बात ही क्या है, यदि उनकी इक्कीस पीढ़ियोंके पितर होते तो उन सबके साथ भी वे तर जाते; क्योंकि तुम्हारे-जैसा कुलको पवित्र करनेवाला पुत्र उनको प्राप्त हुआ॥ १८॥✎ 626 2024

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #626 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीनृसिंहभगवान् ने → श्रीनृसिंहभगवान्‌ने
  • #2024 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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